सात साल… शब्दों में भले छोटे लगते हों, पर हम नवोदयनों के लिए यह सात वर्ष जीवन की सबसे खूबसूरत, सच्ची और सीख देने वाली किताब होते हैं। हॉस्टल में बिताया हर दिन, हर पल, हर याद आज भी दिल के किसी कोने में वैसी ही ताज़ा है—जैसे कल ही की बात हो।
नवोदय में कदम रखते ही सबसे पहला एहसास यही हुआ कि अब घर से दूर रहना होगा। लेकिन कुछ ही दिनों में हॉस्टल के कमरे, बैचमेट्स, रूम पार्टनर, और सीनियर्स—सब एक नए परिवार की तरह बन गए।
रात में रोने वाले वो पहले दिन धीरे-धीरे हँसी के ठहाकों में बदल गए और हॉस्टल जीवन एक नया घर बन गया।
सुबह की PT, लाइन में लगकर डाइनिंग हॉल जाना, समय से क्लास, शाम की खेल-कूद और फिर नाइट स्टडी—उस समय यह सब बोझ जैसा लगता था, लेकिन आज याद आता है तो समझ आता है कि इन्हीं आदतों ने हमें अनुशासन और जिम्मेदारी का असली अर्थ सिखाया।
हॉस्टल लाइफ़ की असली मिठास दोस्तों के साथ ही थी।
एक ही प्लेट में खाना बाँटना…
लेट नाइट बातें…
बाउंड्री फंद कर मार्केट भाग कर जाना....
ग्राउंड में पत्थर के पीछे रात को मैगी बनाना....
मेस से रोटी चुरा लाना…
डोगा सहित चावल गायब कर देना…
स्टोर रूम में भुजा-भात बनाना, अंडाकरी और सब्जियाँ मिलकर पकाना और साथ बैठ कर संग सबके मिल बांट कर खाना.!
और “हाउस मास्टर या नाइट वॉचमैन दिख जाए तो अचानक खामोश हो जाना और अचानक से सारी लाइटे का बंद हो कर सो जाना एक दम से सन्नाटा छा जाना.!
ये सब छोटे-छोटे अनुभव आज भी दिल को हँसी और खुशी से भर देते हैं।
घर से दूर होने के बावजूद नवोदय में हर त्योहार परिवार की तरह मनाया जाता था।
राखी, न्यू ईयर, होली—हर मौके पर पेपर प्लेट्स, मोमबत्ती की रोशनी, डांस, ग्रुप सॉन्ग और हँसी के अनगिनत पल हमें जोड़ते थे।
वो माहौल आज भी दिल में बेहद गर्माहट भर देता है।
खेल के मैदान की दस्ताने वो मैदान आज भी सपनों में आते हैं—
सुबह की दौड़, शाम का क्रिकेट, फुटबॉल, कबड्डी की चीखें, वॉलीबॉल की टक्कर और गर्ल्स हॉस्टल की खिड़कियों से कई नामों की आवाजें आना इंटरहाउस प्रतियोगिताओं की दीवानगी।
हार-जीत तो बस बहाना था… असल यादें तो टीम की एकता, जोश और उन पलों की हैं जिन्होंने हमें खुद से मिलवाया।
नवोदय ने सिर्फ पढ़ाई नहीं सिखाई, बल्कि मंच पर बोलना, कार्यक्रमों का संचालन करना, सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ देना—ये सब हमारी पहचान का हिस्सा बन गया।
हर कार्यक्रम के पीछे की प्रैक्टिस, मेहनत और हँसी-मज़ाक आज भी यादों में एक मीठा दर्द छोड़ जाते हैं।
अंतिम वर्ष की कड़वी-मीठी विदाई
सात साल गुजरते-गुजरते हॉस्टल मात्र एक इमारत नहीं रह जाता—वह हमारी जिंदगी की सबसे प्यारी यादों का खजाना बन जाता है।
आखिरी दिन की विदाई,
दोस्तों से टूटती आवाज़ में किए गए वादे—
“हम जरूर मिलेंगे…”
और कमरे की आखिरी झलक—आज भी आँखें नम कर देती है।
अंत में…
नवोदय हॉस्टल लाइफ़ सिर्फ पढ़ाई और रूटीन का नाम नहीं है, बल्कि जिंदगी जीने का तरीका सिखाने वाली एक अनोखी यात्रा है।
सात सालों में हम बच्चे से युवा बनते हैं, दोस्त से परिवार बनाते हैं, और यादें… जो जीवनभर की पूँजी बन जाती हैं।
नवोदय सिर्फ एक स्कूल नहीं—
वह एक भाव है, एक परिवार है, एक याद है,
जो उम्र चाहे जितनी बढ़ जाए, दिल में हमेशा ताज़ा रहती है।
- शैलेन्द्र साहू जनवि